3 अक्टू॰ 2015

दादरी की गाय

गाय के जरिये  नफरत फेलाने  वालों  जरा  इन लाइनों पर भी  नजर डालिए ?
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पल पल मैं  बदलती  नफरत की हवाओं को देखो 
जिनके लिए फैली है दहशत जरा उन मांओं को देखो 
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दर दर की ठोकर खाती इन सपूतों से आस लगाती
नुक्कड़ नुक्कड़ पूँछ हिलाती इन अबलाओं को देखो 
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जब तक देती है भर भर के दूध पनीर प्यारे  
फिर कूड़ा करकट खाती इन विधवाओं को देखो 
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इनके फेर मैं ना जाने कितने मरेंगे "अखलाक" 
फिर सियासी रंग चढाते इनके रहनुमाओं को देखो .
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.....................................................................MJ 


2 अक्टू॰ 2015

नस्लों मैं भेड़िये

ना जाने यह  कैसे कैसे अभियान चलाते है
फिर इनकी आड़   मैं  यह इंसान जलाते है 
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जब देखा फ़ैल रही है भाईचारे मशालें यहाँ
फिर यह नफरतों के चुभते  बाण चलाते है 
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लड़ाकर हिन्दू मुस्लिम सिख ईसाई आपस मैं 
फिर भी नस्लों मैं भेड़िये यह इंसान कहलाते है 
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गए नहीं कभी मंदिर मस्जिद की चोखट पर
अपना ही धर्म सबसे से ऊँचा हमको सिखलाते है 
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इतने मैं ना हुआ इनका मकसद पूरा  तो
फिर यह दुष्ट गीता और कुरान जलाते है 
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फिर ले जाकर इन मुद्दों को संसद तक "राज"
वहां भी लगता  है जैसे हैवान चिल्लाते  है 
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.............................................MJ deshwali ( RAAJ )





1 अक्टू॰ 2015

अखलाक़

एक अफवाह उडी के  बीफ  खाया जा रहा  है
हम कितने DIGITAL है यह जताया जा रहा है

कोई  धर्म नहीं शायद  इनका फिर कौन है यह
बीफ के नाम पर क्यूँ नफरतों को बढाया जा रहा है

कुछ तो फर्क कर देता  खूँ  मैं  भी ऐ खुदा
जिनके सहारे कत्ले-ऐ-आम मचाया जा रहा है
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कसूर इतना था उस गरीब का वो इक मुस्लिम था
जाने किस किस को यह पाठ  पढाया जा रहा है

क्यों और कब तक मरेंगे यूँही कितने (अखलाक )
मातम है कहीं  तो कहीं जश्न मनाया जा रहा है

यहाँ जब कोई  नहीं सुन रहा  उस गरीब  की आह
दूर कही अनसुलझा  मसला-ऐ-कश्मीर सुलझाया जा रहा है |
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......................................................................MJ DESHWALI



एक मासूम-सी बेटी

प्यारे पापा, जब मैं हॉस्पिटल में एडमिट हुई तब मुझे सांस लेने में परेशानी थी, ब्लड प्रेशर भी कम था और गुर्दे भी ठीक से काम नहीं कर रहे थे, लेकिन अब मैं कुछ ठीक महसूस कर रही हूं। मशीनों से भी तो आजादी मिल गई मुझे।   सबसे अच्छा तब लगा जब आपने मुझे गुरूवार की सुबह कई दिन बाद आपने गोद में लिया। यहां आईसीयू में नर्सेज आपस में बात करती हैं और कहती हैं कि बेटी से भी कोई इतना प्यार कैसे कर सकता है? तब मन ही मन मुस्कराती हूं और सोचती हूं कि वाकई मैं कितनी खुशकिस्मत हूं।

मुझे जन्म देने वाली मां का प्यार तो नसीब नहीं हुआ, लेकिन आपने हर कमी पूरी की।

आपके पास पैसे नहीं थे, इस वजह से मुझे स्लिंग में अपनी गर्दन में लटकाकर रिक्शा चलाया, लेकिन मैं छोटी हूं ना मौसम का यह मिजाज सह नहीं पाई और बीमार हो गई।

मेरी बीमारी में आप कितना परेशान हुए। आपकी परेशानी प्रार्थना बनकर भगवान के दर पहुंची और देखो, उसका प्रभाव आज आपके सामने है। डॉक्टर अंकल ने बताया ना कि मेरा वजन भी बढकर 1735 ग्राम हो गया है।

बस, अब कुछ दिन की ही बात है। ये फंगल इंफेक्शन भी ठीक हो जाएंगे, फिर हम अपने घर चलेंगे। पैसों की परेशानी तो लोगों की मदद से अब दूर हो गई ना पापा। मैं भी बड़ी होकर पढ़ूंगी-लिखूंगी। शुक्रिया उन सभी लोगों को जिन्होंने मेरे पापा की मदद की और मेरे लिए प्रार्थना।

एक जुमला था

जिस तरह से डिजिटल इंडिया (DigitalIndia) का डंका बजाया  जा रहा है
सोचता हूँ  शर्म  करू या गर्व
                                        चलो पहले थोडा गर्व करते है
आजकल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जिस तरह से हिन्दुस्तान को दुनिया के सामने प्रस्तुत कर रहे है उससे लग रहा है के  हमारा देश सचमुच  Digital हो रहा है जिस तरह से दुनिया की बड़ी बड़ी कंपनिया भारत की तरफ उम्मीद भरी नजरो से देख रही है तो लगता है की हमारा अच्छा दौर शुरू हो चूका है
और जिस तरह से विकास की लहरें उठ रही है तो लगता है हमारा आने वाला कल बहुत ही सुनहरी होगा और इसका सारा श्रेय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ही जाता है ....  .जिसका हमें गर्व है

                                                        अब बात शर्म की जाये

शर्म आती है की देश का प्रतिनिधि किसी दूसरे देश में जाकर अपने देश की गरीबी का और भ्रष्टाचार का  दुनिया के सामने बखान करे वो भी किसी देश के प्रतिनिधि की तरह नहीं बल्कि एक पार्टी खास के प्रतिनिधि की तरह
क्या इस देश ने पिछले 60 सालों में कुछ नहीं पाया क्या इस देश में इतनी गरीबी और भ्रष्टाचार था
की जिसको मिटाने के लिए अब हम दूसरे देश में जाकर "मेक इन इंडिया" के लिए हाथ फेलायें
‘यानी मोदीजी पहले आप भारत को ठीक कीजिए।
 इसी तरह ‘डिजिटल इंडिया’ वगैरह के लुभावने नारों से उनका क्या लेना-देना जो इस तरह के नारों का मतलब भी नहीं जानते हो ...जो गरीब जनता 15 लाख के वादे को वादा मान बेठी थी

(खैर वो तो एक जुमला था)

शर्म आती है की 125 करोड़ आबादी का राष्ट्र भारत इतना अपाहिज़ हो चूका हैं।
जिस तरह से तो जो यह इतना तामझाम किया जा रहा  है इससे हासिल क्या होगा
सच है की कुछ वक़्त पहले (चुनाव से पहले)तक जो देश के लोगों में एक जोश सा छाया था जो इंदिरा  और नेहरु के ज़माने भी नहीं था जो बड़े बड़े वादे किये गए थे जो की अबतक जारी है.