15 नव॰ 2015

राष्ट्रपति के नाम एक पत्र

 महामहिम राष्ट्रपति जी आज जो अराजकता या असहिष्णुता फैली हुई है उसके बारे में

कुछ तो बोलिए जनाब ?

आज हमारा भारत सामाजिक विकास के महत्वपूर्ण मानदंडों पर पिछड़ता जा रहा है,

ऐसी स्थिति हमारे लोकतन्त्र के लिए खतरनाक है....यह आप भी बखूबी जानते है

जनाब ,लोकतन्त्र में जनता के भरोसे का खुलेआम मज़ाक बनाया जा रहा है ..

हमारे देश की गरीबी और पिछड़ेपन को विश्वभर में एक बाकायदा मंच लगाकर सुनाया जा रहा है

में पूछना चाहुगा जनाब क्या इस देश ने पिछले 60 सालों में यही पाया है

गरीबी और विकास के बारे मैं कोई बात नहीं हो रही ..बात होती है सिर्फ धर्म और जाती की

कुछ भद्रजन इसको बखूबी  अंजाम दे रहे है ..

महामहिम आप ही ने कहा था अराजकता शासन का विकल्प नहीं हो सकती

लेकिन आज धर्म के नाम साध्वी प्राची, आदित्यनाथ जेसे कुछ जो हर धर्म में मोजूद है

जो धर्म के नाम पर नफरत का जहर उगल रहे है यह अराजकता नहीं तो और क्या है 

कुछ कीजिये महाराज .....इनसे रोकिये यह के लिए बड़ा खतरा है ....

आज कही किसी को कुछ खाने पर मार दिया जाता है

कही किसी को देश से निकालने की बात की जा रही है

किसान की हालत जस से तस है गरीब और लाचार होता जा रहा है

कुछ कीजिये जनाब इससे पहले की कोई आप पर भी ऊँगली उठाये ..

अपने संवैधानिक सीमा में रहकर ही सही पर इतना तो कर दीजिये जनाब .............


                     गणतन्त्र का नागरिक

2 नव॰ 2015

वक़्त

ना  जाने कब कैसे वक़्त बे साख्ता उड़ा
जैसे पंख फैलाये आसमां में फाख्ता उड़ा

मिट गयी ना जाने कैसी कैसी  हस्तियां
जब  जब जिससे भी इसका वास्ता पड़ा

बदलने चले थे कई सिकंदर और कलंदर
ख़ाक हुए जिसकी राह मैं यह रास्ता पड़ा

मत कर गुरूर अपनी हस्ती पर ऐ "जमील ''
कुछ पल उसे देदे सामने जो फ़कीर खड़ा

28 अक्टू॰ 2015

चल पनघट

तूं चल पनघट में तेरे पीछे पीछे आता हूँ
देखूं भीगा तन तेरा ख्वाब यह सजाता हूँ
मटक मटक चले लेकर तू जलभरी गगरी
नाचे मेरे मन मौर हरपल आस लगाता हूँ
जब जब भीगे चोली तेरी भीगे चुनरिया
बरसों पतझड़ रहा मन हरजाई ललचाता हूँ
लचक लचक कमरिया तेरी नागिनरूपी बाल
आह: हसरत ना रह जाये दिल थाम जाता हूँ

25 अक्टू॰ 2015

जुमला भा गया

आहट है कैसी ? वक़्त ये कैसा है आ गया
बनाकर बहाना गाय का कोई इंसान खा गया

टूट पड़े सन्नाटे कल तक खामोशियाँ छाई थी
दंगे ही दंगे है वक़्त -ऐ- हुड्दंग जो आ गया

मिलकर भुगतो चुनली हुकूमतें हमने ऐसी ऐसी
अफसोफ़ लोट के दौर -ऐ- रावण जो आ गया

सहते आये थे फिर कुछ बदलने की आस थी
अब ना कर शिकवा तब हमें जुमला जो भा गया

21 अक्टू॰ 2015

दहशत है फैली

दहशत है फैली हर शहर मोहल्ले मोहल्ले
नफरत भरी गलियां देखो इन हुक्मरानों की
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भाव चवन्नी के बिकती मजबूर काया यहाँ
बेगेरत मरती आत्मा देखो सियासतदानों की
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तिल तिल मरते कर्ज में डूबे अन्नदाता यहाँ
सुखा है दूर तलक देखो  हालत किसानों की
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धर्म की बड़ी दीवार खड़ी  है  चारों  और यहाँ
जानवर निशब्द है औकात नहीं इन्सानों की
................................................................MJ
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