31 जुल॰ 2018

फेसबुक वाली दुनियां

जहां हर तरह की इंसानी मखलूक पाई जाती है
यह वो तिलिस्मी जगह है जहां कोई कुछ भी बन सकता है

गधा शेर बन जाता है ...वो अलग बात है वो ढेंचू ढेंचू करने   पर जल्द ही पहचान लिया जाता

नर .. मादा बनकर ख्वाबों को कीबोर्ड पर ढालने की कोशिश करता है,

सारे गांव के बच्चों से मार खाने वाला "डेशिंग बॉय" बना हुआ है स्टेटस लिखेगा ...
" जिस गली से गुजरते है लोग खिड़कियां बंद कर लेते है "
हालाकि बाद में कोई बताता है कि कल पापा की उड़ती हुई चप्पल कान के नीचे बजी थी,

सुबह सारे मोहल्ले का गोबर उठाने वाली पापा की परी बनी हुई है .. शाम को स्टेटस देखिए ..Going to Shoping...

कुछ प्रिंसेस भी होती है .एक खूबसूरत DP के साथ
पोस्ट लिखेंगी ... " हेलो दोस्तो आज कैसी लग रही हूं "
इनकी पोस्ट पर हजारों लाखों की तादाद में लाइक कॉमेंट मिलेगे अक्सर ऐसी आईडी के पीछे किसी गफूर भाई का हाथ होता है

कुछ युवा नेता भी है ..
यह प्रोफ़ाइल फोटो में नेता जी के बगल में खड़े है
फोटो देख कर ऐसा लगेगा जैसे सारी हुकूमत का दारोमदार इन्हीं के कंधो पर है....इनकी अहम ज़िम्मेदारी यह होती है कि
नेता जी के जन्मदिन या किसी भी प्रोग्राम का दावत नामा सारे शहर में फैला दे ... डिजाइन दार

कुछ प्रिंस भी है ....
ऊपर आसमान में मुंह करके सेल्फी लेंगे जैसे कि फूंक मारकर आसमान को धकेल देगा, फिर वही सेल्फी अपलोड करके लिखेंगे ..
"हैसियत की बात मत करो हम मच्छर भी Ak 47 से मारते है"
हालाकि फायर होने पर मेरी तरह झटका भी सहन नहीं कर सकते ...

आखिर में मुझ जैसे लोग...
जो दिन में दो चार पोस्ट करने के बाद पतली गली से निकल जाते है, फिर दूर खड़े  होकर तमाशा देखते रहते है 😋


20 जुल॰ 2018

कालिया की साईकिल

काळ्यो कूद पड्यो मेऴे में -साईकल पंक्चर कर ल्यायो

यहां पर पहली बात तो यह देखना है की वो मेला कोनसा था
जिसमें  कालिया बिना सोचे समझे ही कूद पड़ा..

अगर यह मिर्धा पार्क में हर चार महीने बाद लगने वाला मेला है तो जब शहर में इतनी शानदार और चमकती रोड़ें बनी हुई है
फिर भी उसकी साईकल पंचर कैसे हो गई ?
या कालिया किसी विरोधी पार्टी का था इसलिए साजिश के तहत उसकी साईकल पंचर कर दी गई...

गाना आगे चलता है ......
"दो दिन ढब जा रे डोकरिया- छोरी म्हारी बाजरियो काढ़े.."

यहां पर गाना किसी और ही एंगल पर चला गया है
यहां गाने के हिसाब से खेतों में बाजरी की फसल पक चुकी है फसल की कटाई का काम चल रहा है..लड़की घरवालों की मदद कर रही है ... यहां यह भी पता चलता है कालिया की सास उसे प्यार से डोकरिया नाम से बुलाती है,😉

आगे है ..
"के बाजा बाज रिया डूंगर में - छोरी तने लेबाऴो आयो.."

यहां ऐसा लाग रहा है कालिया कोई रंगीला किस्म का लड़का है गाजे बाजे यानी DJ के साथ अा रहा है..
ओर जो पीर पहाड़ी (डूंगर) को चीरती हुई रिंग रोड़ निकली है कालिया उसी की और से अा रहा है DJ के आवाज गूंज रही है डूंगर में .. और दूर दूर तक सुनाई दे रही है

चलिए आगे सुनते है....
"जयपुर जाजे कब्जो ल्याजे - कब्जो लाल बूटी को.."

इसका मतलब यह हुआ है यह जो लाल बूंटी का मांग रही है
वो सिर्फ जयपुर में ही मिलता है, अपने शहर में नहीं मिलता
या फिर डीडवाना में मिलता तो है लेकिन छोरी को वो पसंद नहीं है...

आगे चलिए...
"छोरी चटक मटक मत चाले - कमर में लचको पड़ ज्यागो.. "

यहां सीधा सा मतलब यह कि अगर ज़्यादा टेढ़े मेढे चलोगे तो
कमर में दर्द हो जाएगा,और फिर आपको बांगड़ हॉस्पिटल में डॉक्टर को दिखाने जाना पड़ेगा और डॉक्टर का कोई भरोसा नहीं वो टाइम पर मिलेगा या नहीं..हो सकता है छुट्टी पर हो
 फिर बड़ी मुश्किल हो जाएगी..

थोड़ा आगे सुनते है
" छोरी छपरा में लुक ज्या ये - तन्नेे लेवणियों आयो.. "

अब यहां गाना अपनी संस्कृति में वापस लौट आया है, यानी कि जब लड़की के ससुराल से कोई आता है तो
लड़की ससुराल वाले के मान सम्मान की खातिर सामने नहीं आती राजस्थान के गांवों में अक्सर ऐसा होता है...
यहां यह भी पता चलता है कि लड़की का परिवार गरीब है और विकास अभी उनके यहां नहीं पहुंचा है
इसीलिए तो लड़की की मां उसे छपरे में छिपने को बोल रही है कमरे में छिपने के लिए भी तो कह सकती थी

काळ्यो कूद पड्यो मेऴे में - साईकल पंक्चर कर ल्यायो

अंत में कुल मिलाकर गाने का यह मतलब निकलता है की
कालिया एक बेरोजगार और गरीब लड़का है किराए की गाड़ी नहीं ला सकता, पेट्रोल महंगा है किसी की मोटर साईकिल भी मांग कर नहीं ला सकता ...इसलिए वो
अपनी साइकिल पर शहर में लगा मेला देखता हुआ आया है और वहां पर किसी ने उसकी साइकिल की हवा निकाल दी ..

ओर उसकी सास ने सिर्फ अपने दामाद की बड़ाई के लिए इतना ड्रामा रचा है.....
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16 जून 2018

राणा जी माफ करना


सालों पहले आई फिल्म "करन अर्जुन" का कहीं से सामने अा गया, लिखने को कुछ था नहीं तो सोचा चलो इस गाने का ही पोस्टमार्टम करते है..😂😁

गाना है ......
"छत पे सोया था बहनोई, में तने समझ के सो गई,
मुझको राणा जी माफ करना गलती म्हारे से हो गई,"
यहां गाने के हिसाब से गर्मी का मौसम था,

और उस गांव में बिजली नहीं थी या बार बार काटी जा रही थी
मतलब तब भी बिजली का हाल आज की तरह ही था, इसलिए बहनोई को छत पे सुलाया गया था, अगर बिजली सही तरीके से रहती तो बहनोई को कूलर वाले कमरे में सुलाते  😁

गाना आगे बढ़ता है......
"बहनोई ने ओढ़ रखी थी चादर, में समझी पिया का है बिस्तर,
आधे बिस्तर पे वो साया था, आधे पे में सो गई
मुझको राणा जी माफ करना गलती म्हारे से हो गई,"

यहां पता चलता है कि उसका बहनोई कोई बकलोल किस्म का आदमी था, क्योंकि उसने इतनी गर्मी में भी चादर ओढ़ रखी थी और वो सिकुड़ कर आधे बिस्तर पर सोया था,
पूरे बिस्तर पर आराम से फैल कर भी तो सो सकता था,😁

चलिए गाना आगे बढ़ाते है ......
"भूल हुई मुझसे कैसा अचम्भा,बहनोई था पिया जितना लंबा
चूर थी में दिनभर की थकन से, पड़ते ही बिस्तर पे सो गई
मुझको राणा जी माफ करना गलती म्हारे से हो गई "

यहां पता चलता है कि उसके पिया का नाम राणा जी है
जिससे यह बार बार माफी मांग रही थी,और वो अच्छा खासा लंबा भी है, अगर छोटे कद का होता तो लंबा नहीं बताती,
और हां इसमें अचम्भे वाली कोई बात नहीं है
क्योंकि उसका पिया "अंधभक्त"  किस्म का निकम्मा और नेताओ के आगे पीछे घूमने वाला आदमी है कोई काम धंधा नहीं करता, अगर वो काम करता होता तो यह दिन भर में इतनी नहीं थकती की बिस्तर का भी होश नहीं रहा,😊😊

पूरे गाने में खास बात यह है कि यह सारी बातें बहनोई चुपचाप सुन रहा था, उसने कोई भी सफाई पेश नहीं की,
इसलिए मैने पहले भी कहा है कि उसका बहनोई भी कोई बकलोल किस्म का आदमी था 😁😀

खैर अपना क्या है उसका बहनोई जाने और उसका पिया
अपने को तो बस लिखना था लिख दिया 😉😉 .
....

14 जून 2018

परदेस में चांद रात

कल यहां भी "ईद" है परदेस में... !!!

शायद दाना हमारे नसीब का

रब ने यूं बखेरा है परदेस में

चुन रहे है तिनका तिनका

वो सब अपनों की ईदी है

कल यहां भी "ईद" है परदेस में.... !!!

यहां चांद कौन देखता है भला

बस तुम्हारी तरह यहां भी कल ईद है

सुबह का बचा खाना खा कर लेता हूं

कमरा बिखरा है दुरुस्त करना है

कल साथी मिलने आयेंगे "शायद"

कल यहां भी "ईद"है परदेस में..... !!!

नींद तो कब की फाख्ता हो गई

मुझे कल के बर्तन भी धोने है

अलार्म लगा कर सो जाऊंगा

मम्मी ना जगाएगी यहां परदेस में

कल यहां भी "ईद"  है परदेस में....!!!

गर वक़्त पर जागा तो "जमील"

कल वहीं कपड़े पहन लूंगा

जो इस्त्री करके रखे है मैने

फ़िक्र है अपनी की ईद चांद हो जाए

बस यही तो हमारी ईदी है

कल यहां भी "ईद" है परदेस में....!!!☹️
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11 जून 2018

गांव के बूढ़े बाबे

कच्चे घरों में पक्के रिश्ते होते थे
तब यह गांव वाले कितने मीठे होते थे ..

अब मोटी दीवारें हैं घर घर के बीच में
पहले तो हर आंगन रिश्ते नाते होते थे

अब कौन सुनाए चबूतरे पर कहानियां ,
वहां पहले तो कुछ बूढ़े बाबे होते थे

सिर्फ यादें है उस नुक्कड़ की "जमील"
जिस नुक्कड़ पर चाय के ढाबे होते थे

वो डमरू वाला आता था खेल दिखाने
जब मोबाइल जैसे ना कोई तमाशे होते थे 

फुर्सत मिले तो जीने की कोशिश करना
वो पल जब अपनों संग ठहाके होते थे
.