8 मार्च 2018

प्रदेश का जीवन

सुबह जल्दी उठो नौकरी पर जाओ
फिर आओ फिर कुछ खाओ और सो जाओ
फिर कल उठो फिर वही दोहराओ....असल में प्रदेश में जीवन यही है 😂

और यह सब उसी दिन शुरू हो जाता है जब घर निकलते है
यह सिलसिला तबतक जारी रहता है जब तक वापस घर नहीं पहुँच जाते
लेकिन घर से निकलने और वापस पहुँचने के बीच जो फासला
है वही तक़दीर का फैसला है
और उस दिन के बाद से ज़िंदगी की जद्दो जहद जारी रहती है
घर से निकलने वाले दिन के वो पल याद रह जाते है जब मां कहती है
बैठा कोई चीज भूल तो नहीं गए
ना..... कुछ नहीं भूला बस सबकुछ भूल गया

वो बच्चो के साथ बिताये पल वो गाँव की गलियां.... बस यादें....
दिन दो दिन महीने फिर साल और कई साल यूं ही यादों में गुजर जाते है

11 फ़र॰ 2018

बचपन फिर ना लौटेगा

वो बचपन की किलकारियां
ना कोई दुश्मन ना यारियां
सर पे ना कोई ज़िम्मेदारियाँ
वो मासूम सी होशियारियाँ,

वो बचपन फिर ना लौटेगा !

वो धूप में नंगे पाँव दौड़ना
कभी कीचड़ में लौटना
ना हारना ना कभी थकना
कभी बे वजह मुस्कुराना,

वो बचपन फिर ना लौटेगा !

गली गली बेवजह दौड़ना
खिलोने पटक कर तोड़ना
टूटे खिलोने फिर से जोड़ना
छोटी छोटी बात पर रूठना,

वो बचपन फिर ना लौटेगा !

कभी मिटटी के घर बनाना
घरों को फिर मिटटी से सजाना
कभी दिन भर माँ को सताना
फिर माँ की छाती से लिपट सो जाना,

वो बचपन फिर ना लौटेगा
हाँ !!  वो बचपन फिर ना लौटेगा

8 फ़र॰ 2018

चलो पकोड़ा बेचा जाए

लिखने पढने की ऐसी तैसी  
छोड़ छाड़  के सारी किताबें 
बाजार से बेसन खरीदा जाए  
चलो पकौड़ा बैचा जाऐ,
.
फीस फास का कोई संकट नहीं
स्कूल का भी कोई झंझट नहीं
भूल जाओ नोकरी वोकरी  
पहले एक ठेला खरीदा जाए 
चलौ पकौड़ा बेचा जा,
.
रोजगार का नया तरीका है  
कितना सुन्दर सरकारी सलीका है  
कोई मतलब नहीं डिग्री विग्री का  
फर्जी है यह सारा रगड़ा लफड़ा  
क्यों इसमें दिमाग खपाया जाए  
चलो पकोड़ा बेचा जाए,

.

28 जन॰ 2018

खैल की मंडी

मंच सजा
बोलियां लगी
ये बिका
वो बिका
उसे इसनें खरीदा
इसे उसने खरीदा
कला बिक गई
खैल बिक गया

बोली लगी
अमीरों ने लगाई
कौन बिका
कौन रह गया
गरीबों नें तालियां बजाई

किसी को ढैला ना मिला
कही पैसों की बरसात हो गई
बिकना भी अब यहां
सम्मान की बात हो गई

क्या मेरी टीम
क्या तेरी टीम
सब पैसों का खैल है
निचोड़ रहे है जो
बस गरीबों का ही तेल है
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दहशत है मोहल्ले मोहल्ले

दहशत है फैली हर शहर मोहल्ले मोहल्ले
नफरत भरी गलियां देखो इन हुक्मरानों की

धर्म की बड़ी दीवार खड़ी है चारों और यहाँ
जानवर निशब्द है औकात नहीं इन्सानों की

जद में आएंगे ना जाने कितने 'चन्दन' व 'अकरम'
ज़िंदा तो ! मगर तुम पर भी हैं नजर हैवानों की