25 दिस॰ 2018

तूं कश्मीर चल

गर तुझे जानना है ज़ुल्म इंतिहा
तूं कश्मीर चल...
गर तुझे दर्द का अहसास नहीं
तूं कश्मीर चल...
गर तुझे जानना है बर्दाश्त की हद
तूं कश्मीर चल...
गर तुझे देखना है छलनी कलेजे
तूं कश्मीर चल...
गर तुझे देखना है फूलों के जनाजे
तूं कश्मीर चल...
गर तुझे देखना है खौफ के साए
तूं कश्मीर चल...
गर तुझे देखना है पत्थरों का रोना
तूं कश्मीर चल...
गर तुझे देखना है आंसुओं का सैलाब
तूं कश्मीर चल...
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फूफा जी......😊😊

आज आपको बताएंगे फूफा जी के बारे में
देखिए ..फूफा जी एक ऐसे शख्स को कहते है जो दामाद, जीजा जी, का हसीन सफ़र पूरा कर चुका होता है...
या यूं समझ लीजिए की वो अब रिटायर्ड दामाद है और इनको सिर्फ राय मशवरे के टाइम ज़्यादा याद किया जाता है
ससुराल में किसी नए दामाद का उदय होने के बाद इनका
सिक्का लगातार गिरता रहता है.और इनके स्वभाव में चिड़चिड़ापन आ जाता है 😊
शादियों में इनकी बड़ी अहमियत होती है
रिश्तेदार को मनाना हो, खाने के क्या बनाना है, या टेंट कैसे लगाने है, ऐसे कामों के लिए इनकी राय लेना बहुत जरूरी होता है....
खासकर रिश्तेदारों को मनाने में इनका अहम रोल होता है
लेकिन अगर यह खुद रूठ जाए तो इनको मनाने के लिए काफी पापड़ बेलने पड़ते है 😊 फिर जैसे तैसे मान भी गए
तो शादी में इनका खास ख्याल रखा जाता है..
कुछ फूफा खड़ूस होते है..
पीछे हाथ बांध कर ऐसे ऑर्डर फेंकते है जैसे किसी सलतनत के महाराज हो...हुक्म मानना भी पड़ता है गुजरे वक़्त के जीजाजी जो ठहरे..वक़्त ने अब इनको फूफा जी बना दिया है
कुछ फूफा बहुत शालीन होते
जहां कुर्सी लगा दी बैठ जाते है अकेले घंटों बैठे रहेंगे
मजाल है वहां से उठ जाए 😊आखिर में जब बारात आ जाती है तो इनको मिठाई वाले रूम में बिठा दिया जाता है .
कुछ फूफा अलग ही किस्म के होते है
इनका लेवल अलग ही होता है बच्चों से हंसी मजाक करते करते इनकी नज़रें हर कोने को ताक रही होती है, यह सुनते कम सुनाते ज़्यादा है 😂..
कुल मिलाकर फूफा जी चाहे जैसा भी हो उनका
मान सम्मान करना हमारी परम्परा है....
इसलिए कमेंट में दो शब्द कहकर सभी फूफाओं का सम्मान बढ़ाएं 😊

अलाव

ठंडी सर्द हवाएं
जलता अलाव
उसके इर्द गिर्द
यारों का जमघट
मोबाइल चुरा ले गया वो दिन..

बुझे हुए अलाव से
राख के ढेर को
खुरच खुरच
चिंगारी ढूढना
मोबाइल चुरा ले गया वो दिन..

रोज शाम ढले
मांगकर लकड़ियां
उसी अलाव पर
फिर अलाव जलाना
मोबाइल चुरा ले गया वो दिन..
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10 अक्टू॰ 2018

चुनाव रो टेम है

बांधा ला जीत रो सेहरो
जोरको चुनाव रो टेम है...
म्हारी बात गांठ बांधल्यो
लोगां न बस ओ ही बेम है..


म्हे ही अठे का चोधरी
बरसां बरस करां ला राज..
बतावे तो डूंगर का डूंगर
ढेला को करयो ना काज..

पहन लिया धोऴा कुर्ता
पगा में चरचराती मोजड़ी
जद निकऴ्यो राज रो घमंड है
पचे तो लागे जियां रोजड़ी

पकड़ कर नेता जी रो पल्लो
लोग बाग मजा काट रिया है
आज है काल रो काईं भरोसो
लपक लपक कर चाट रिया है

महे ही नेताजी रा लंगोटिया
गोडां सूधो है म्हारो राज
संभऴ ज्यो रे बावऴी बूंचो
बे थारा काल हुया ना ही आज
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17 सित॰ 2018

बेचारा Nimbuzz..

बात शायद 2008 की बात है जब मार्केट में एक भगवा रंग का मैसेंजर आया था " Nimbuzz "
और आते ही धमाल मचा दिया था खासकर खाड़ी देशों में
उस वक़्त फेसबुक भी 4 साल का हो गया था लेकिन
FB का इतना क्रेज नहीं था जितना Nimbuzz का था

उसके क्रेज का अंदाजा इसी से लगा सकते है कि आज भी
कई फेसबुक प्रोफ़ाइल पर working at nimbuz लिखा दिख जाएगा .. 

यह तो ठीक है कि आज यह ज़िंदा नहीं है
वरना इसके भगवा कलर की वजह से इसे भी धार्मिक रंग दे दिया जाता ...... बोलो Nimbuzz बाबा की जय..

बड़ी कमाल की चीज थी
खाड़ी देशों में यह बड़ी टाइमपास की चीज थी क्योंकि इसमें भी ग्रुप हुआ करते थे..कनेक्टिविटी का बेहतरीन साधन बन चुका था ...... तेरी nimbuzz आईडी बता जल्दी से

इसमें भी वॉट्सएप की तरह लात मारके ग्रुप से बाहर निकाल दिया जाता था. बिना वार्निंग के......
और कई गफूर भाइयों ने पिंकी बनके लोगों को चम्पू बनाने का हुनर भी यहीं से सीखा था..

इसके लिए मार्केट में bamboo जैसे सॉफ्टवेयर भी आए थे जो सामने वाले के मोबाइल को डांस करवा देते थे...

वो कहते हैं ना वक़्त के थपेड़े किसी को नहीं छोड़ते
वक़्त ने इसका भी वही हश्र किया 
वॉट्सएप और फेसबुक की आंधी में बेचारा Nimbuzz  गुमनामी के अंधेरे में कहीं खो गया..

लेकिन फिर भी कहीं ना कहीं  इतिहास के पन्नों में इसका नाम भगवा अक्षरों में लिखा जाएगा.....